Monday, July 6, 2009

हाईफन

संशोधन लगाऊं तो हाईफन बने
कुछ इतने करीब हैं हमारे-तुम्हारे रिश्ते

Friday, February 6, 2009

इनकी बेशर्मी देखिए

आप सबको मालूम है हरियाणा के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश के कद्दावर नेता भजनलाल के बेटे चंद्रमोहन ने धर्म परिर्वतन कर अनुराधा बाली से प्रेम विवाह किया है. चंद्रमोहन चांद मोहम्मद और अनुराधा फिजा बन गई . यह प्रेम कहानी कुछ दिन तक तो ठीक चली. उसके बाद इसमें फांस पड़ गई. कुर्सी गंवा बैठे चंद्रमोहन एक दिन फिजा के घर से चले गए. इसके बाद मोहब्बत की इस कहानी में लगातार नए-नए किस्से सामने आ रहे हैं. फिजा पहले एसएमएस लेकर सामने आईं. अब चंद्रमोहन की खून से लिखी चिट्ठी सामने लेकर आई हैं.चंद्रमोहन और अनुराधा काफी समय से एक-दूसरे को जानते थे. दोनों ने अपना बुरा-भला सोचकर यह कदम उठाया था. फिर अचानक यह सब क्या हुआ ? यह किसी को समझ में नहीं आ रहा. अनुराधा कई बार पत्रकारों के सामने आ चुकी हैं. चंद्रमोहन थोड़ी कंजूसी बरत रहे हैं. पहली बार चांद मोहम्मद और फिजा ने साझा रूप से पत्रकारों के सामने अपनी प्रेम कहानी को दुनिया के सामने रखा था. चंद्रमोहन ने कहा था कि अब उनका अपने परिवार से कोई नाता नहीं है. यह सब अगली सुबह चंडीगढ़ के अखबारों की सुर्खी बना. चंद्रमोहन पंचकूला रहते रहे हैं. वह कालका से विधायक हैं. पंचकूला की महिलाओं ने इस खबर को पढ़कर मुंह बिचकाया था. महिलाओं का कहना था-भाई साबह बड़े बेशर्म हैं.इस प्रेम कहानी पर समाज के हर वर्ग ने तीखी प्रतिक्रिया की थी. कुछ का कहना था कि दोनों का खुमार जल्दी उतर जाएगा. और हुआ भी वही. अब दोनों के रास्ते अलग हो चुके हैं. फिजा तो कहानी को कानूनी अंजाम तक ले जाने का अल्टीमेटम दे चुकी हैं. वह कहती हैं कि उनके साथ छल हुआ है. छल किसके साथ हुआ है. यह तो समय बताएगा. सबसे बड़ा सवाल है लोक-लाज की परवाह न करते हुए दोनों ने मोहब्बत का जो ताजमहल खड़ा किया. वह रेत की महल की तरह ढह गया है. अब चंद्रमोहन आगरा गए हैं ताजमहल देखने और अनुराधा मोहाली में पानी पी-पीकर शौहर की बेवफाई को तार-तार कर रही हैं. प्यार में एतबार किया और अब धोखा. वह इसे स्वीकार नहीं कर पा रहीं. वैसे इस कहानी को लैला-मजनूं, शीरी-फरिहाद जैसी अमर प्रेम कहानियों के साथ जोड़कर देखा गया था.बात सिनेमा तक बनाने तक गई थी. पटकथा तक तैयार बताई गई थी. इस प्रेमकथा का उपसंहार उसका नायक इतनी जल्दी लिख देगा. यह किसी ने सोचा तक न था. वैसे इस विषयवस्तु पर फिल्म जरूर बननी चाहिए. बहस होनी चाहिए. सवाल होने चाहिए-आखिर दिलों के रिश्ते इतनी जल्दी चटखते क्यों हैं? क्या आकर्षण इतनी जल्दी खत्म हो जाता है? क्या नेताओं को ऐसे कदम उठाने चाहिए? जिससे सामाजिक ताने-बाने पर गलत असर पड़े.

Tuesday, November 25, 2008

बच्चे के सपने

कितना तकलीफदेह होता
हैबच्चे के सपने पूरे न कर
पानाऔर कितना दुखद होता हैकिसी
अपने का वादा करके न
निभाना(सामने आने पर ठेंगा दिखा देना)
सचमुच यह बातें बहुत परेशान
करती हैंबच्चों को अच्छी
तालीम दिलाने का सपना
हर बार टूटता हैन जाने
क्यों...?कभी पैसे नहीं होते,कभी-कभी बीमारी
तोड़ देती हैअब तो बच्चों से
आंख मिलाने में डर लगता है
बड़ा तो अभावों को
सहते-सहते समझदार हो गया
हैउसने जिद करनी छोड़ दी
हैपर छोटे को कौन समझाएहालांकि
वह भी बाप की मजबूरी समझने लगा है
सोचा था, इस साल उसे
सैनिक स्कूल में भेजेंगे-यह
एक पिता का सपना थाछोटे ने
खूब मेहनत कीखूब तैयारी कीउफ....फार्म
भरने की नौबत ही नहीं बन पाई....और
एक सपना साकार होने से पहलेफिर टूट गया
यह टूटन बहुत पीड़ा
देती हैरात के सन्नाटे में दफ्तर से
निकलते हुए आंसू निकलने
लगते हैंमन सोचता हैछोटू ने
पूछा डैडी कब भेजेगो सैनिक
स्कूल तो क्या जवाब दूंगा
यह सवाल मुझे बेचैन करता
हैमैं घर समय पर नहीं पहुंचना
चाहतामैं सोचता हूं कि घर ऐसे
वक्त जाऊं जब वह सोता
मिलेऔर सुबह मेरे जगने से
पहले स्कूल चला जाएऔर
दोपहर में उसके घर लौटनेसे पहले
मैं दफ्तर आ जाऊं
अब मैं यही करने लगा हूंछह
दिन उससे मुलाकात नहीं
होतीसाप्ताहिक अवकाश के दिन
वहजरूर मेरे पास आता है-सवाल
लेकरवह पूछता है क्या तबियत
खराब हैऔर मेरे गर्दन हिला
देने पर उदास होकर चला
जाता हैआंगन में खेलने यह
इशारों का संवाद कब तक
चलेगावह बड़ा होगा तो मैं उसे
क्या जवाब दूंगाउसके सपने
को तोड़ने की सजा मुझे
मिलनी चाहिएताकी
मेरी तकलीफ
कुछ कम हो सके
मुकुंद

Friday, October 10, 2008

कितने रावण

कितने रावण


वक्त- शाम का
तिथि- नौ अक्टूबर
वर्ष- दो हजार आठ
हर तरफ
हर साल
की तरह
जलता रावण
और तमाशबीन खुश
इनमें से कुछ लोग
अत्याचारी लंका के राजा
के वध से खुश हैं
पर अन्य की खुशी
की राज बहुत गहरा है
इनके मन मस्तिष्क में
अनगिनत रावण हैं
वह जिंदा हैं, जिंदा रहेंगे
इन्हें मारने की जरूरत है

जेबतराश-सोचते हैं
हर साल जले रावण
हर साल उमड़े
और ज्यादा भीड़
ताकि ज्यादा से ज्यादा
पर्स आ सकें हाथ
मनचले खुश
वह सोचते हैं
पूरे शहर की जवान
लड़कियां रावण देखने
आएं-ताकि वह
भीड़ का फायदा
उठाकर उनके बदन का
स्पर्श कर सकें
ठरकी बुड्ढे खुश
वासनाओं के विस्फोट
से ग्रस्त यह
जमात सोचती है
हर बार दशहरा
मैदान में बहु-बेटियों की
उम्र की महिलाएं
ज्यादा से ज्यादा
तादाद में पहुंचे
वह पास खड़े होकर
उन्हें घूरते रहें
खाकी वर्दी खुश
पुलिस वाले सोचते हैं
अगले बरस
अपराध का ठेका
बीस लाख में जाए
देश के चुनिंदा अपराधी आएं
खूब जेब कटें
सैकड़ों वाहन पार हों
खराब माल बेचने वाले खुश
वह सोचते हैं
जमकर सड़े आलू
के समोसे बिकें
खूब मुनाफा हो
साल का कोटा
दशहरा पूरा कर जाए
प्रशासन और ठेकेदार खुश
पंडाल और कुर्सियों
के ठेके की आधी रकम
जेबों में चली जाए
मौसियां खुश
वह सोचती हैं
आज की रात
लडकियों के जिस्म
की अच्छी कीमत मिलेगी
यह सब अतृत्प रावण
रूपी इच्छाएं हैं
इन्हें मारो
यह जब जिंदा हैं
तब तक रावण को जलाने
के कोई मायने नहीं
ऐसे सड़े समाज में बापू का रामराज
हमेशा कोसों दूर रहेगा
नेता भाषण देगा
राम जैसे बनो
क्या पुतले को जलाकर
राम बना जा सकता है?
नहीं...नहीं...नहीं

मुकुंद

Friday, September 5, 2008

हंसी बन आना

आना तो ऐसे
आना तो
आना लपट बनकर
बनकर आंच

कभी नहीं आना
धुआं बनकर
बनकर राख

लहर बनकर आना
आना बनकर हिलकोर

कभी नहीं आना
भंवर बनकर
बनकर ठहराव

रंगत बनकर आना
आना बनकर भीनी गंध
हंसी बन आना
पंखुरियों की

कभी नहीं आना
बनकर शिशिर का विषाद

अथाह नीली गहराई लिए आना
आना लिए हुए अघोर नीला विस्तार
धैर्य लिए हुए आना धरती का
आना लिए ताजी सृष्टि का मुस्कान

आना नहीं कभी
लिए हुए सावन की सुबह का असमंजस
भादों की सांझ की खामोशी

-कवि विजय बहादुर सिहं

बाबू जी कविताएं

मौत

कमरे के कोने में
कीड़ों की घात में बैठी है छिपकली
सांस तो लेती है
मालूम कुछ होता नहीं
चुपचाप दीवार से
दुम को दबाए
आंख भींचे है
प्राण हरती है हर एक के
धोखे में है दुनिया


रिश्वत

क्या आगे
क्या पीछे
क्या ऊपर
क्या नीचे
सभी जगह है किस्मत
राज प्रमुख है रिश्वत



मिलन

छुओ
छलको
मिलो
मुझसे
गीत
गाकर
मिले जैसे नदी सागर
पास आकर

केदारनाथ अग्रवाल, बांदा (उत्तर प्रदेश)


बाबूजी से बांदा में पढ़ाई के दौरान अनिगनत बार बस अड्डे के पीछे उनके घर पर मिलने का मौका मिला. उनके प्रिय पात्र कृष्ण मुरारी पहाडिया थे. मैं उनके पास अकसर गोपाल गोयल, दिनेश देवराज, अमितेंद्र नाथ अमित और चंद्रिका जी के साथ जाता था. सबसे छोटा था. नया-नया कवि बना था. वह खूब चाव से सुनते थे. उनकी यह कविताएं आज लखनऊ की एक सरकारी पत्रिका में छपी थीं। वहां से नोटकर ब्लाग में डाल रहा हूं. विश्वास है, पसंद आएंगी.-मुकुंद

शून्यकाल

यह शून्यकाल है युग बदलने का
बीसवीं शताब्दी जाने के पहले धोखा दे रही है

प्रसिद्ध पत्रकार रघुवीर सहाय